छत्तीसगढ़ ने खोया लोकसंस्कृति का अनमोल रत्न: पंडवानी की अमर स्वर-साधिका पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन, एम्स में ली अंतिम सांस
रायपुर। छत्तीसगढ़ की माटी की महक और लोकसंस्कृति को सात समंदर पार तक पहुँचाने वाली विश्वविख्यात पंडवानी गायिका, पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। 72 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया है। उन्होंने रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में देर रात करीब 3:15 बजे अंतिम सांस ली। वे बीते 27 मई से अस्पताल में उपचाररत थीं। उनके निधन की खबर आते ही पूरे छत्तीसगढ़ सहित देश-विदेश के कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।


एम्स में चल रहा था इलाज
डॉ. तीजन बाई पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं। स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद उन्हें 27 मई को रायपुर एम्स में भर्ती कराया गया था, जहाँ डॉक्टरों की विशेष टीम उनकी देखरेख कर रही थी। लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी उन्हें बचाया नहीं जा सका और देर रात उन्होंने इस नश्वर संसार को अलविदा कह दिया।
कापालिक शैली को दिलाया वैश्विक सम्मान
तीजन बाई ने उस दौर में पंडवानी गाना शुरू किया था जब महिलाओं के लिए मंच पर आकर प्रस्तुति देना बेहद कठिन माना जाता था। उन्होंने पंडवानी की ‘कापालिक शैली’ में प्रस्तुति देकर न केवल रूढ़ियों को तोड़ा, बल्कि अपनी बुलंद आवाज, अनोखी आंगिक चेष्टाओं और हाथ में तंबूरा लेकर जब वे मंच पर उतरती थीं, तो देश-दुनिया के दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती थीं। उन्होंने भारत के अलावा एशिया, यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया सहित दुनिया के अनेक देशों में पंडवानी का सफल प्रदर्शन कर छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को वैश्विक मंच पर एक विशिष्ट पहचान और सर्वोच्च सम्मान दिलाया।
पद्मश्री से पद्म विभूषण तक का सफर
तीजन बाई की अद्वितीय कला साधना को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें देश के तीनों शीर्ष नागरिक सम्मानों से नवाजा था:
- पद्मश्री (1988): कला के क्षेत्र में शुरुआती योगदान के लिए।
पद्म भूषण (2003): कला को नए आयाम देने के लिए।
पद्म विभूषण (2019): देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान।
इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नृत्य शिरोमणि, कला शिरोमणि सहित सैकड़ों राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। उन्हें मानद डॉक्टरेट (डी.लिट.) की उपाधि भी प्रदान की गई थी।
कला जगत में अपूरणीय क्षति
डॉ. तीजन बाई का जाना केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि वैश्विक कला संस्कृति के लिए एक युग का अंत है। उनके निधन पर प्रदेश के राजनेताओं, साहित्यकारों, रंगकर्मियों और उनके लाखों प्रशंसकों ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए इसे एक अपूरणीय क्षति बताया है। उनके द्वारा गाई गई पंडवानी की गूंज हमेशा लोगों के दिलों में जीवित रहेगी।

