April 21, 2026

hareli Tihar 2025: हरेली का त्योहार या फिर जादू–टोना, भूत प्रेत की रात?, जानिए घरों के बाहर क्यों लगाए जाते हैं नीम के डाल

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Hareli Me Tona Totka Hota Hai Ya Nahi; सावन की अमावस्या (Sawan Amavashya) यानी अंधकार की सबसे गहरी रात, लेकिन छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में यही रात रोशनी, हरियाली और प्रकृति के प्रति आभार की भावना से भर उठती है।

छत्तीसगढ़ का पारंपरिक त्यौहार 'हरेली'

छत्तीसगढ़ का पारंपरिक त्यौहार ‘हरेली’ (Hareli 2025) आज प्रदेश भर में उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। खेतों में हरियाली का उत्सव, बैलों और हल की पूजा, और मिट्टी से जुड़ी भावनाओं का पर्व—हरेली केवल त्यौहार नहीं, गांव की आत्मा है।

किसान करते हैं हल और बैलों की पूजा

हरेली (Hareli) के दिन किसान अपने कृषि औजारों जैसे हल, कुदाल, गैंती, फावड़ा, सिकल आदि को साफ करके उनकी विधिवत पूजा करते हैं। बैलों की जोड़ी को नहलाया जाता है, उन्हें हल्दी, तेल लगाकर सजाया जाता है और छत्तीसगढ़ी व्यंजन—चीला, फरा, बोबरा और महुआ के लड्डू का भोग अर्पित किया जाता है। यह दिन प्रकृति के आशीर्वाद को स्वीकार करने और खेती की शुरुआत से पहले उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का पर्व होता है।

घरों के बाहर नीम की डाल क्यों लगाते हैं?

हरेली पर्व (Hareli Parv) के दिन छत्तीसगढ़ के गांवों में एक खास परंपरा निभाई जाती है—घर के दरवाजे पर नीम की डंडियां या टहनी लगाना। इसके पीछे धार्मिक के साथ-साथ वैज्ञानिक कारण भी छुपे हैं।

नीम प्राकृतिक रोग नाशक

नीम को प्राकृतिक रोग नाशक माना जाता है। सावन का महीना बीमारियों का सीजन होता है—मलेरिया, डेंगू, वायरल फीवर जैसी बीमारियों के लिए यह मौसम अनुकूल होता है। नीम की गंध और तेल में मौजूद एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-वायरल गुण कीटाणुओं को दूर रखने में मदद करते हैं।

घर में प्रवेश नहीं करतीं बुरी शक्तियां

मान्यता है कि घर के बाहर नीम की डाल लगाने से बुरी शक्तियां प्रवेश नहीं करतीं। हालांकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो यह संक्रमण को रोकने की लोक-स्मृति में विकसित परंपरा हो सकती है।

हरेली और अंधविश्वास: जागरूकता की चुनौती

जहां एक ओर हरेली (Hareli) लोक आस्था और प्रकृति पूजन का पर्व है, वहीं कुछ इलाकों में यह रात टोना-टोटका (Tona Totka)  और टोनही (Tonhi) के अंधविश्वासों से जुड़ जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में फैली मान्यताओं के अनुसार, हरेली की रात भूत-प्रेत (Hareli Me Bhoot Pret) और बुरी आत्माएं (Buri Aatmaye) अधिक सक्रिय रहती हैं।

डराकर उठाते हैं फायदा

कुछ असामाजिक तत्व इसी मानसिकता का फायदा उठाकर लोगों को डराते हैं, महिलाओं पर टोनही (चुड़ैल) होने का आरोप लगाते हैं, जिससे कई बार सामाजिक बहिष्कार या हिंसा तक हो जाती है।

छत्तीसगढ़ अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने संभाला मोर्चा

इन्हीं अंधविश्वासों के खिलाफ अब छत्तीसगढ़ अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने मोर्चा संभाला है। हरेली पर्व ( Hareli Parv) की रात वे गांवों में जागरूकता रैलियां, नुक्कड़ नाटक और चर्चा सत्र आयोजित करते हैं ताकि लोग भ्रम और डर के जाल से बाहर निकल सकें।

संस्कृति और विज्ञान का संगम बने हरेली

हरेली त्योहार (Hareli Tyohar) छत्तीसगढ़ की माटी की महक, मेहनत की पूजा और आस्था की अभिव्यक्ति है। लेकिन इसके साथ ही यह जरूरी है कि लोक परंपराओं को विज्ञान और विवेक के साथ जोड़ा जाए। घरों के बाहर नीम लगाने की परंपरा केवल आस्था नहीं, स्वास्थ्य रक्षा की पारंपरिक बुद्धिमत्ता भी है।

समाज सुधार का माध्यम

अंधविश्वास और भय की जगह यदि शिक्षा, जागरूकता और वैज्ञानिक सोच को स्थान मिले, तो हरेली जैसे पर्व सिर्फ संस्कृति नहीं, समाज सुधार का भी माध्यम बन सकते हैं।


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