April 21, 2026

हर बार जलाने के लिए आग की जरूरत नहीं होती…इन चीजों से भी जल सकता है मनुष्य..जानिए क्या कहती हैं चाणक्य नीति

Acharya Chanakya Ki Niti

आचार्य चाणक्य को श्रेष्ठ विद्वानों में से एक माना जाता है. आज उनकी गिनती एक बेहतरीन लाइफकोच के रूप में होती है. आचार्य को धर्म, राजनीति, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र आदि तमाम विषयों की गहन जानकारी थी. उनकी किताबों में लिखी बातों को लोग आज भी ध्यान से पढ़ते हैं और उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत करके लोगों को सीख देते हैं.


वर्षों पहले आचार्य जो बा​तें कह चुके हैं, वो आज के समय में भी सटीक साबित होती हैं. आचार्य चाणक्य का नीति शास्त्र नामक ग्रंथ लोगों के बीच काफी पसंद किया जाता है जिसे तमाम लोग चाणक्य नीति के नाम से भी जानते हैं. आचार्य ने नीति शास्त्र में एक श्लोक के जरिए कुछ चीजों के बारे में बताया है, जो व्यक्ति को अंदर ही अंदर जला देती हैं. इसके बाद व्यक्ति के अंदर जीवित रहने की इच्छा भी समाप्त होने लगती है.

कान्ता वियोगः स्वजनापमानि, ऋणस्य शेषं कुनृपस्य सेवा,
कदरिद्रभावो विषमा सभा च, विनाग्निना ते प्रदहन्ति कायम्.

इस श्लोक के जरिए आचार्य कहते हैं कि व्यक्ति के लिए कुछ स्थितियां बेहद कष्टकारी होती हैं, जो उसे अंदर से झुलसाकर यानी जलाकर रख देती हैं. इसके बाद व्यक्ति का मनोबल टूटने लगता है और वो खुद को कमजोर समझने लगता है.

1. पहली, पत्नी से वियोग होना. पति पत्नी को एक रथ के दो पहिए कहा जाता है, दोनों को एक दूसरे की बहुत जरूरत होती है. ऐसे में अगर पत्नी बीच मझधार में पति से दूर हो जाए तो वो टूट जाता है. ऐसा व्यक्ति अंदर ही अंदर झुलसता रहता है. उसका जीवन के प्रति रवैया एकदम उदासीन हो जाता है.

2. दूसरी अपने ही लोगों द्वारा बेइज्जत होना. ऐसा व्यक्ति जो अपने ही लोगों से बार बार बेज्जत होता है, उसके लिए बार बार अपमान का घूंट पीकर जीना बहुत मुश्किल होता है. ऐसा व्यक्ति अंदर से काफी घुटन महसूस करता है. उसके लिए ये जीवन बोझ की तरह होने लगता है.

3. तीसरी कर्ज. कर्ज व्यक्ति के लिए बोझ की तरह होता है. इस बोझ में दबा व्यक्ति न तो खुलकर सांस ले पाता है और न ही चैन से जिंदगी जी पाता है. उसके लिए एक एक पल कष्टकारी होता है.

4. चौथी दुष्ट राजा की सेवा करना. सेवा करना अच्छी बात है, लेकिन अगर व्यक्ति को किसी के दबाव में आकर दुष्ट राजा की सेवा करनी पड़े तो व्यक्ति को बहुत खलता है. उसके अंदर गुस्से की आग धधकती है और इसके कारण वो खुद को ही परेशान कर बैठता है.

5. पांचवी गरीबी. आचार्य चाणक्य स्वयं गरीबी को अभिशाप मानते थे. गरीबी व्यक्ति से काफी कुछ छीन लेती है. इसके कारण व्यक्ति को हर चीज पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है. गरीब व्यक्ति जो महसूस करता है, ये सिर्फ वो ही समझ सकता है.

6. छठवीं कमजोर लोगों की सभा. यदि सभी कमजोर लोग एक साथ जुट जाएं तो मंथन के नाम पर सिर्फ समय की बर्बादी होती है. कुछ हासिल नहीं होता. ऐसी स्थिति में हर कोई खुद को श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश में लगा रहता है.


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